(१९)
भूल गयीं क्या प्राणेश्वरी ! तुम,
दिव्य-धाम की वे बातें,
जिनको गाते रहते मुनिजन,
फिर भी पार नहीं पाते.
तुम चाहे बिसरा दो मुझको,
मैं तुमको कैसे भूलूँ ?
तुमसे अधिक न पास और कुछ,
जिसके झूले पर झूलूँ.
(२०)
सकल साध मेरे जीवन की,
एक तुम्हीं राधारानी.
रह न सकूँ मैं बिना तुम्हारे,
जैसे मीन बिना पानी.
फिर भी पूर्णरूप से ऐसा,
उचित नहीं कहना मेरा,
तत्व एक ही हमदोनों हैं,
भेद नहीं मेरा-तेरा.
(२१)
जो तुम हो वह मैं हूँ संगिनी !
जो मैं वही सदा तुम हो,
जैसे पय में उज्ज्वलता है,
वैसे ही हैं हमदोनों.
पावक में दाहकता जैसे,
और भूमि में जैसे गन्ध,
वैसे ही है हमदोनों का,
यह अभेद पावन सम्बन्ध.
(२२)
उपादान बनकर रहती हो,
सृष्टि-समय तुम मेरे साथ.
रचना का सब भार प्रिये !
मिलकर लेते हम अपने हाथ.
कुम्भकार मृत्तिका बिना,
कैसे घट का निर्माण करे ?
बिना स्वर्ण कैसे स्वर्णक,
कुण्डल को रूप प्रदान करे.
(२३)
प्राणप्रिये ! ऐसे ही मैं,
तुम बिना नहीं कुछ कर पाता,
आदिकाल से चला आ रहा,
हमदोनों का यह नाता.
बनती हो आधार सृष्टि की,
जब तुम हे जग की रानी,
बीजरूप मैं बनता हूँ तब,
सुनो मंगले कल्याणी !!
(२४)
रासेश्वरी, सौन्दर्य-शालिनी,
तुम शोभा मेरे तन की,
सुनो देवि ! भावना यही है,
प्यारे भक्तों के मन की.
तुमसे पृथक हुआ ज्योंही मैं,
'कृष्ण' मुझे वे कहते हैं,
तब कहते 'श्रीकृष्ण' मुझे वे,
जब हम संग में रहते हैं.
(२५)
तुम हो मूलप्रकृति की स्वामिनी,
प्रकट हुयी मेरी माया,
लीला-कारण से दोनों,
रखते हैं भिन्न-भिन्न काया.
हमदोनों के आत्मरूप से,
भरा चराचर जग सारा,
जो लेता पहचान तत्व यह,
बन जाता जग से न्यारा.
(२६)
शक्ति बुद्धि औ' ज्ञान तेज में,
भी हमदोनों एक समान,
सकल जगत की माता हो तुम,
मैं हूँ विश्वपिता भगवान्.
भेद मानता हमदोनों में,
जो अति खल पातकी महान,
नरक भोगता कालसूत्र में,
जबतक चन्द्र-सूर्य द्युतिमान.
(२७)
ब्रम्हा, धर्म, अनन्त, शारदा,
लक्ष्मी, कार्तिक, कपिल, गणेश,
महाशक्ति श्रीदुर्गा देवी,
सावित्री औ' काल, महेश,
ये मुझको प्राणों सम प्यारे,
पर तुम प्राणों से प्यारी,
ये बसते अपने लोकों में,
तुम मेरे मन की क्यारी.
(२८)
यद्यपि भेद नहीं प्राणेश्वरी !
हम-तुम दोनों एक समान,
फिर भी सदा विकल रहते हैं,
हेतु तुम्हारे मेरे प्राण.
सुनो मुझे कितना प्यारा है,
प्राणाधिके तुम्हारा नाम,
इतना कहकर प्रेम-सिन्धु में,
हुये निमज्जित प्रभु घनश्याम.