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वंश-परिचय

* श्रीराधिकावल्लभो विजयते *  
           

           (१)
व्रज नरेश थे नन्द महामति,
  परम दयाकर धर्मनिधान,
जिनके घर में प्रकट हुए,
  लीला दिखलाने श्रीभगवान्.
उन्हीं नन्द के परम मित्र,
  वृषभानु गोप थे भक्त महान,
जन्म लिया था सूर्य-अंश से,
  बहुत बड़े थे प्रतिभावान.

           (२)
प्रकट हुयीं उनके गृह में,
  श्रीकृष्णप्रिया राधारानी,
धूम मची वृषभानु-पुरी में,
  धरा हुयी यह सुखसानी.
पहुँचे गर्गाचार्य वहाँ तब,
  राधा-महिमा बतलायी,
मुदित हुये वृषभानु गोप,
  यह इच्छा मन में जब आयी.


           (३)
बोले ऋषि से विदित तुम्हें,
  नाता जिससे होगा जिसका,
त्रिकालज्ञ सर्वज्ञ बता दें,
  कौन सुपति होगा इसका ?
नन्दलाल-गोपाल-कृष्ण ही,
  इनके पति हैं परम सुजान,
नाता नित्य अमर दोनों का,
  सुनें ध्यान से हे ! मतिमान. 
           
           (४)
दिव्य-धाम में परम-ब्रम्ह,
  श्रीकृष्णचन्द्र की पटरानी,
प्रकट हुयी हैं आज वही,
  तव गृह में श्रीराधारानी.
अति सुन्दर भाण्डीर-कुञ्ज में,
  निर्मल कालिन्दी के तीर-
व्याह करायेंगे दोनों का,
  जगत विधाता ही मतिधीर.  

भाण्डीरवन-वर्णन


           (५)
व्रजमण्डल में यमुना तट पर,
  परम दिव्य था वन-भाण्डीर,
जहाँ शान्ति पाने के इच्छुक,
  जाया करते थे मुनि धीर.
तीनों ताप मिटा देती थी,
  वृक्षों की शीतल छाया,
जिसके रजकण से पावन,
  होती थी मुनियों की काया.

           (६)
विटपों की डाली पर बैठे,
  पक्षी गीत सुनाते थे,
'राधे-राधे कृष्ण-कृष्ण' कह,
  सबको निकट बुलाते थे.
वृक्ष-लताएँ झूम-झूम कर,
  करती थीं अनुपम नर्तन,
प्रेम-भक्ति में बेसुध होकर,
  राधा-मोहन-संकीर्तन. 

नन्दजी का भाण्डीर-वन गमन


           (७)
एक दिवस श्रीकृष्णचन्द्र को,
  लिये गोद में नन्द सुजान,
चले गये भाण्डीर-कुञ्ज में,
  उर प्रेरक थे श्रीभगवान्.
दी आज्ञा गोपों को व्रजपति-
  ने गायों को लाने की,
स्वयं खड़े थे बाट देखते,
  निज गायों के आने की.

           (८)
सहसा नभमण्डल में ऐसी,
  श्याम-घटाएँ घिर आयीं,
अन्धकार छा गया कुञ्ज में,
  प्रभु ने लीला दिखलायी.
वेग-सहित बह चला पवन,
  आ गया वहाँ अब झंझावात,
टूट रहे थे वृक्ष-पत्र  सब,
  पाकर प्रबल पवन आघात.
 

भाण्डीर-वन में श्रीराधा का आगमन


           (९)
चिन्ता में पड़ गये नन्द,
  फिर नारायण का ध्यान किया.
मन में अपने इष्टदेव के,
  अमित गुणों का गान किया.
वन में प्रकटी परम ज्योति तब,
  सभी दिशाएँ चमक उठीं,
'दिव्य' सुवासित श्रीअंगों से,
  सभी दिशाएँ गमक उठीं.

           (१०)
अहा ! अहे ! वृषभानु-कुमारी !
  कैसे यहाँ चली आयी ?
करके स्मरण गर्ग की बातें,
  मन में भक्ति उमड़ आयी.
लगे देखने जगजननी की,
  अनुपम शोभा औ' श्रृंगार,
मातृ-भक्ति में विह्वल होकर,
  बहता नयनों से जलधार.

           (११)
नीलवसन भूषित अंगों पर,
  विलसित कांची  कंकन , हार,
श्रीराधा  के 'दिव्य'-भूषणों -
  की रचना थी विविध प्रकार.
सभी भूषणों से प्रकाश की,
  अनुपम किरणें झरती थीं,
भक्तों का मन उज्जवल कर वे,
  अन्धकार को हरती थीं.
  
           (१२)
कर प्रणाम बोले व्रजपति तब,
  देवि ! तुम्हें पहचान लिया,
श्रीहरि की तुम प्राणप्रिया हो,
  मैंने अब यह जान लिया.
खेल रहे मेरे अंकों में,
  कृष्णचन्द्र तव पति प्यारे,
मेरे और यशोदारानी-
  के नयनों के हैं तारे.

           (१३)
समझ रहा हूँ कृष्णचन्द्र मम-
  पुत्र नहीं ये हैं भगवान्,
फिर भी इनको पुत्रभाव से,
  पोष रहा हूँ मैं अज्ञान.
ले जाओ तुम देवि ! इन्हें,
  लौटा देना फिर मेरा धन,
देखो कैसे देख रहे हैं,
  तुम्हें तुम्हारे मन-मोहन.

           (१४)
हँसकर श्रीराधारानी ने,
  कृष्णचन्द्र को साथ लिया,
फिर बोलीं वे नन्द-गोप से,
  तुमने तप है बहुत किया.
मैं प्रसन्न हूँ तुम पर व्रजपति,
  पुलकित मेरे तन-मन-प्राण,
नहीं समय यह फिर आयेगा,
  ले लो चाहे जो वरदान.
   

नन्दजी को श्रीराधा का वरदान


           (१५)
सुनकर वाणी जगजननी की,
  नयन नन्द के भर आये.
रोमांचित हो गए अंग फिर-
  बोले वचन सु-मन भाये.
युगलमूर्ति के श्री चरणों में,
  मम मति-गति-रति का वरदान,
जगदम्बे ! सानिध्य दानकर,
  रच दो आज परम कल्याण.
    

श्रीकृष्ण को साथ लेकर श्रीराधा का गमन


           (१६)
"एवमस्तु !"- कह मातु राधिका,
  हुयीं प्रविष्ट गहन-वन में,
साथ लिए श्रीकृष्णचन्द्र को,
  ज्यों विद्युत श्यामल-घन में.
तदनन्तर ही प्रकट हो गया,
  दिव्य-लोक का रास वहाँ,
अन्तर्हित घनश्याम हो गये,
  क्या जाने वे गये कहाँ ?

           (१७)
विस्फारित नयनों से चारों-
  ओर देखतीं श्रीराधा,
कहाँ गये मेरे जीवन-धन,
  आयी यह कैसी बाधा ?
डूबीं जैसे ही चिन्ता में,
  दीख पड़े श्रीनटनागर,
परम 'दिव्य' कैशोर मूर्ति में,
  बुला रहे थे प्राणेश्वर.

           (१८)
जैसे ही देखा निज पति को,
  मुदित हुयीं राधारानी.
अंग-अंग सब नाच उठे,
  भर आया नयनों में पानी.
देख प्रीति निज प्राणप्रिया की,
  दौड़ पड़े श्रीवनमाली,
लगा हृदय से श्रीराधा को,
  बोले प्रभु शोभाशाली.

श्रीकृष्ण द्वारा श्रीराधा-तत्व का निरूपण


           (१९)
भूल गयीं क्या प्राणेश्वरी ! तुम,
  दिव्य-धाम की वे बातें,
जिनको गाते रहते मुनिजन,
  फिर भी पार नहीं पाते.
तुम चाहे बिसरा दो मुझको,
  मैं तुमको कैसे भूलूँ ?
तुमसे अधिक न पास और कुछ,
  जिसके झूले पर झूलूँ.

           (२०)
सकल साध मेरे जीवन की,
  एक तुम्हीं राधारानी.
रह न सकूँ मैं बिना तुम्हारे,
  जैसे मीन बिना पानी.
फिर भी पूर्णरूप से ऐसा,
  उचित नहीं कहना मेरा,
तत्व एक ही हमदोनों हैं,
  भेद नहीं मेरा-तेरा.

           (२१)
जो तुम हो वह मैं हूँ संगिनी !
  जो मैं वही सदा तुम हो,
जैसे पय में उज्ज्वलता है,
  वैसे ही हैं हमदोनों.
पावक में दाहकता जैसे,
  और भूमि में जैसे गन्ध,
वैसे ही है हमदोनों का,
  यह अभेद पावन सम्बन्ध.

           (२२)
उपादान बनकर रहती हो,
  सृष्टि-समय तुम मेरे साथ.
रचना का सब भार प्रिये !
  मिलकर लेते हम अपने हाथ.
कुम्भकार मृत्तिका बिना,
  कैसे घट का निर्माण करे ?
बिना स्वर्ण कैसे स्वर्णक,
  कुण्डल को रूप प्रदान करे.

           (२३)
प्राणप्रिये ! ऐसे ही मैं,
  तुम बिना नहीं कुछ कर पाता,
आदिकाल से चला आ रहा,
  हमदोनों का यह नाता.
बनती हो आधार सृष्टि की,
  जब तुम हे जग की रानी,
बीजरूप मैं बनता हूँ तब,
  सुनो मंगले कल्याणी !!

           (२४)
रासेश्वरी, सौन्दर्य-शालिनी,
  तुम शोभा मेरे तन की,
सुनो देवि ! भावना यही है,
  प्यारे भक्तों के मन की.
तुमसे पृथक हुआ ज्योंही मैं,
  'कृष्ण' मुझे वे कहते हैं,
तब कहते 'श्रीकृष्ण' मुझे वे,
  जब हम संग में रहते हैं.

           (२५)
तुम हो मूलप्रकृति की स्वामिनी,
  प्रकट हुयी मेरी माया,
लीला-कारण से दोनों,
  रखते हैं भिन्न-भिन्न काया.
हमदोनों के आत्मरूप से,
  भरा चराचर जग सारा,
जो लेता पहचान तत्व यह,
  बन जाता जग से न्यारा.

           (२६)
शक्ति बुद्धि औ' ज्ञान तेज में,
  भी हमदोनों एक समान,
सकल जगत की माता हो तुम,
  मैं हूँ विश्वपिता भगवान्.
भेद मानता हमदोनों में,
  जो अति खल पातकी महान,
नरक भोगता कालसूत्र में,
  जबतक चन्द्र-सूर्य द्युतिमान.

           (२७)
ब्रम्हा, धर्म, अनन्त, शारदा,
  लक्ष्मी, कार्तिक, कपिल, गणेश,
महाशक्ति श्रीदुर्गा देवी,
  सावित्री औ' काल, महेश,
ये मुझको प्राणों सम प्यारे,
  पर तुम प्राणों से प्यारी,
ये बसते अपने लोकों में,
  तुम मेरे मन की क्यारी.

           (२८)
यद्यपि भेद नहीं प्राणेश्वरी !
  हम-तुम दोनों एक समान,
फिर भी सदा विकल रहते हैं,
  हेतु तुम्हारे मेरे प्राण.
सुनो मुझे कितना प्यारा है,
  प्राणाधिके तुम्हारा नाम,
इतना कहकर प्रेम-सिन्धु में,
  हुये निमज्जित प्रभु घनश्याम.            
     

श्रीराधा-नाम की महिमा


           (२९)
नयनों में भर गया प्रेमजल,
  रोमांचित हो उठा शरीर,
लगा हृदय से प्राणप्रिया को, 
  लगे बताने श्रीयदुवीर.
सुन लेता जिस समय किसी के,
  मुख से केवल 'रा' अक्षर,
दे देता निज भक्ति उसे तब,
  'दिव्य' भाव से मैं भरकर.

           (३०)
फिर भी रहता अति सभीत मैं,
  प्राणप्रिये ! मन-ही-मन में,
पुरस्कार भी उचित नहीं,
  दे सका इसे मैं जीवन में.
जब 'धा' का उच्चारण करता,
  वह प्राणी अपने मुख से,
नाम जान निज प्राणप्रिया का,
  मैं भर जाता हूँ सुख से.

           (३१)
नाम-श्रवण का लोभ लिये मैं,
चल पड़ता उसके पीछे,
'राधा' नाम-सुधा-धारा तब,
पीता हूँ मैं जी भरके.
पावन नामामृत मंजुल से,
भर जाते तब मेरे कान,
प्राणप्रिये ! तब मधुर ध्यान से,
होते शीतल रसमय प्राण.      

श्रीराधा की विनयशीलता


           (३२)
बात समाप्त हुयी माधव की,
  बोलीं तब राधारानी,
कृष्ण-प्रेम में सनी हुई,
  अधरों पे खिली कोमल वाणी.
सदा असम्भव हे भगवन ! मैं,
  तुम्हें भूल जाऊँ हे नाथ !
मेरा तो अस्तित्व बँधा है,
  तव पावन नामों के साथ.
  
           (३३)
बिना तुम्हारे नहीं प्राणधन !
  राधा का अपना जीवन,
आदिकाल से अर्पित है,
  तव चरणों में मेरा तन-मन.
जैसे चाहो इसे नचा लो,
  राधा प्रभो ! तुम्हारी है,
मुझको आशा इन चरणों की,
  जिनकी महिमा न्यारी है.

           (३४)
नारी का श्रृंगार स्वपति ही,
  उसका ले अवलम्ब महान,
सभी नारियाँ कर सकती हैं,
  इस जग में अपना कल्याण.
सती-धर्म का तत्व यही है,
  पति को ही समझे भगवान्,
सकल कर्म हों पति सेवा  में,
  मिटे न पलभर उसका ध्यान.

           (३५)
यही सुनिश्चित मत है मेरा,
  प्राणेश्वर ! घनश्याम सुजान,
धरा हो या हो 'दिव्य' लोक,
  स्वामी ! तुमसे मेरा अभिमान.
जहाँ नहीं चर्चा कान्हा की,
  नहीं सुहातीं वे बातें,
एक तुम्हीं से हे नटवर !
  इस जग में सब मेरे नाते.

श्रीराधा द्वारा बाल्यकाल की एक घटना सुनाना


           (३६)
नामामृत ही नाथ तुम्हारा,
  मेरे जीवन का आधार,
एक दिवस की अद्भुत लीला,
  तुम्हें सुनाती हूँ कर्तार !
'दिव्य' बालिका रूप धरे मैं,
  लोट रही थी पृथ्वी पर,
पितृ-गृह में तभी मुदित मन-
  से प्रकटे नारद मुनिवर.

           (३७)
ज्यों ही देखा उन्हें पिता ने,
  श्रद्धानत हो किया प्रणाम,
बुलवाया फिर श्रीदामा को,
  ज्येष्ठ भ्रातृ मम शोभा धाम.
तात ने लेकर मम भ्राता को,
  मुनि चरणों में डाल दिया,
मुनिवर ने वात्सल्य-स्नेह से,
  भरकर आशीर्वाद दिया.

           (३८)
मुनि बोले- वृषभानु सुनो, अति-
  सुन्दर लाल तुम्हारा है,
राम-कृष्ण-प्रिय-सखा सदा यह,
  आशीर्वाद हमारा है.
मम भ्राता के दिव्यांगों ने,
  मुनिवर को जब किया स्पर्श,
कृष्ण-प्रेम जग गया ह्रदय में,
  होता बार-बार था हर्ष.

           (३९)
प्रात: से नारद ब्रज में,
  करते थे मेरा अनुसंधान,
भ्राता को आशीष दिया फिर,
  आया उनको मेरा ध्यान.
सोचा सायंकाल हुआ,पर-
  नहीं दिखीं श्रीकृष्णप्रिया !
चरण बढ़े थे ज्यों चलने को,
  उन्हें पिता ने रोक लिया.

           (४०)
की विनती करबद्ध नमन हो,
  सुनो नाथ अति सुकुमारी-
कन्या जन्मी है मेरे गृह,
  तेजपुंज शोभा न्यारी.
'दिव्य' ज्योति से उसके मुनिवर,
  जगमग करता मेरा धाम,
मिलकर चारों महामुनियों ने,
  रखा है उसका 'राधा' नाम.

           (४१)
सुन्दरता की धनी है ऐसी,
  जैसे हो कोई देवप्रिया,
अहोभाग्य ! ऐसी कन्या ने-
  मेरे गृह में जन्म लिया.
पर चिन्ता है एक बात की,
  सुने ध्यान से करुणाऐन.
नेत्र निमीलित ही रहते हैं,
  नहीं खोलती अपने नैन.

           (४२) 
निस-दिन रहती ध्यान-मग्न वह,
  उसपर दया-दृष्टि हो नाथ !
मुनिवर भी तब मुझे देखने,
  आये तुरत तात के साथ.
कहा पिता से मुनि नारद ने,
  रहें आप कुछ क्षण बाहर.
मैं थोड़ा उपचार करूँगा,
  ध्यान लगाकर गोप-प्रवर.

देवर्षि नारद को श्रीराधा-दर्शन


           (४३)
देवर्षि ने भक्तिभाव से-
  भरकर गायीं स्तुतियाँ,
मिला तभी आदेश ब्रम्ह का,
  ध्यान करो ब्रज की गलियाँ.
उन गलियों के नायक की -
  जैसे ही महिमा गाओगे,
खुल जायेंगे नेत्र-युगल,
  गोलोक को सम्मुख पाओगे.

           (४४)
एकमात्र अवलम्ब यही है,
  धन्य बने जिससे जीवन,
ब्रह्म-वाक्य सुन कृष्ण-भक्ति में,
  डूब गया नारद का मन.
किया स्तवन मुनिवरेण्य ने,
  लिया तुम्हारा पावन नाम,
प्रकट हुयी मैं नित्यरूप में,
  सखियों के संग हे घनश्याम !!

           (४५)
दर्शन-पा बोले मुनिवर,
  वृषभानु सुनो अब मेरी बात,
कोई नहीं बदल सकता,
  तव पुत्री का स्वभाव हे तात !
रक्षा करो महादेवी-सम,
  इस कन्या का हे मतिमान !
वास करेंगे सदा तुम्हारे-
  घर में रमा-सहित भगवान्.

श्रीकृष्ण-नाम की महिमा


           (४६)
मैं माता की सुखद गोद में,
  करती थी उनका पय-पान,
लगे तात फिर मुझे खेलाने,
  और सुनाने वन्दन-गान.
जब 'जय कृष्णमनोहारिन' की,
  ध्वनि गूँजी इन कर्णों में,
सुनकर उनसे नाम तुम्हारा,
  हुयी विकलता प्राणों में.

            (४७)
खुले नेत्र तब मेरे गिरधर !
  हुये मुदित माता और तात,
मुझे सचेतन करने का अब,
  मन्त्र हो गया उनको ज्ञात.
इतना मनहर नाम तुम्हारा,
  इससे ही मैं जीती हूँ,
मन-मन्दिर में तुम्हें बसाकर,
  ध्यान-सुधा नित पीती हूँ.

श्रीकृष्ण द्वारा श्रीराधा-दर्शन के उपाय बताना


           (४८)
बोले प्रभु हे देवि ! सुनो,
  नारद मुनि तो हैं भक्त-महान,
मेरे दर्शन करने उसदिन,
  आ पहुँचे थे परम सुजान.
" नारायण ! नारायण !! " कहकर -
  आदर सहित प्रणाम किया,
बोले यहाँ से अब जाऊँगा,
  जहाँ पे जन्मीं कृष्णप्रिया.

           (४९)
मम इच्छा से रहे भटकते,
  ब्रज की गलियों में मुनिवर,
पहुँचे द्वार तुम्हारे सायं-
  अस्त हो चले जब दिनकर.
तव-दर्शन की 'दिव्य' साधना,
  जग को मुझे बतानी थी,
लगन बिना ना मिलती राधा,
  यही बात समझानी थी.

           (५०)
पूर्ण फल गोविन्द दरश का,
  वह प्राणी ही पाता है,
विह्वल होकर कृष्ण-धाम-
  जो " राधे ! राधे !! " गाता है.
'राधा' नाम की धारा पाकर,
  खुल जाते वैकुण्ठ के द्वार,
किन्तु सर्वप्रथम तजने -
  पड़ते हैं मन के सभी विकार.

श्रीकृष्ण द्वारा श्रीराधा का दिव्य श्रृंगार


           (५१)
बैठो हृदय -स्वामिनी आओ !
  परम मनोहर आसन पर,
मैं अनुपम श्रृंगार तुम्हारा-
  करूँगा इस सिंहासन पर.
नहीं करो संकोच प्रिये !
  अभिलाषा है मेरे मन की,
बिना खुले अधरों ने कहा तब-
  जो आज्ञा जीवन-धन की.

           (५२)
लगे सजाने श्रीराधा को,
  नटनागर श्रीकृष्ण सुजान,
तन्मयता में डूब गये प्रभु,
  रहा न उनको कुछ भी ध्यान.
ब्रजदेवी के चन्द्रानन औ',
  कर-कमलों का किया श्रृंगार,
प्राणप्रिया के चरण सजाने-
  का फिर प्रभु ने किया विचार.

           (५३)
ज्योंही प्रभु ने चरण पकड़कर,
  धरी तूलिका अपने हाथ,
हाथ पकड़ बोलीं श्रीराधा-
  यह तुम क्या करते हो नाथ ?
बोले हँसकर राधावर तब,
  हुआ प्रेम से पुलकित गात,
रासेश्वरी, मम प्राणप्रिये तुम,
  सुनो ध्यान से मेरी बात.

श्रीराधा का महान पातिव्रत


           (५४)
पतिव्रता नारी का तो यह,
  होता है कर्तव्य महान,
पूर्ण करे वह सभी कामना-
  पति की, जो उसका भगवान्.
सकल जगत की पतिव्रताओं-
  में तुम हो सबसे न्यारी,
पार्वती और अनुसूया भी,
  गाती तव महिमा भारी.

           (५५)
तुम-जैसा प्रियतम मिल पाना,
  होती है सौभाग्य की बात,
देवलोक की सकल देवियाँ-
  भी करतीं इच्छा दिन-रात.
दो प्राणेश्वरी ! चरण-कमल निज,
  मैं अब इन्हें सजाऊँगा,
परम-धाम-वैकुण्ठ-लोक का,
  इन पर चित्र बनाऊँगा. 

श्रीराधा-चरणों की महिमा


           (५६)
महादिव्य ऐश्वर्य-विभूषित,
  होगा चरण-कमल-श्रृंगार,
इतना सुन बोलीं ब्रजदेवी,
  लेकर मन में अनुपम-प्यार.
अर्थ मुझे इसका समझा दो,
  मेरे प्राणेश्वर, भगवान् !
बोले प्रभु गम्भीर भाव से-
  सुनो अर्थ तुम देकर ध्यान.

          (५७)
जो चाहे ऐश्वर्य महासुख,
  जग में हो नित उसका मान,
मूर्ति-रूप में इन चरणों की,
  नित्य करे पूजा और ध्यान.
इस जग में सुख भोग सभी वह,
  पहुँचेगा गोलोक के द्वार,
छूटेगा भव-बन्धन उसका,
  मिट जायेंगे सभी विकार.

           (५८)
जगत पितामह ब्रम्हा ने भी,
  एकबार यह ठान लिया,
चरण-वन्दना के विचार से,
  युगों-युगों तक ध्यान किया.
पहुँचे पुष्कर-क्षेत्र विधाता,
  किया कठिन तप का आरम्भ,
बीते साठ सहस्त्र वर्ष जब,
  मिटा ब्रह्म होने का दम्भ.

           (५९)
मन की निर्मलता ने उनकी,
  मुझको ऐसा मोह लिया,
अविलम्ब हो पूर्ण कामना-
  मैंने यह वरदान दिया.
हर्षित मन से हो प्रसन्न,
  वे चले गये फिर अपने लोक,
ज्ञात उन्हें चरणों की महिमा,
  जिनसे मिट जाते सब शोक.

           (६०)
इतना कह राधा के श्याम ने,
  चरणों का श्रृंगार किया,
प्रेमभाव से उन्हें निहारा,
  प्रश्न पूछ आनन्द लिया.
उठो प्रिये ! देखो दर्पण में,
  अपना यह सौंदर्य महान,
तनिक कहीं भी त्रुटि मिले तो,
  मुझे करा दो उसका भान.

           (६१)
अधरों पर मुस्कान लिये-
  दर्पण में राधा ने देखा,
देख स्वयं की अद्भुत शोभा,
  हुयी प्रबल स्नेह रेखा.
मुग्ध हो रही मैं अपने पर,
  धन्य-धन्य हो नटनागर,
सिद्धहस्त हो राधा कहती,
  त्रिभुवन में तुम सुखसागर.

           (६२)
लेकर अपने कर-कमलों में,
  प्राणप्रिया का हस्त-कमल,
रोमान्चित हो गये श्यामघन,
  भर आया नयनों में जल.
सकल कला की जननी हो तुम,
  मेरे प्राणों की रानी !
मिली मुझे प्रेरणा कला की,
  तुमसे ही हे कल्याणी !!

श्रीराधा-कृष्ण का दिव्य हिंडोले पर झूलना


           (६३)
चले गये निज प्राणप्रिया-संग,
  वे नटनागर नन्दकिशोर,
उस निकुंज में पड़ा हुआ-
  अति 'दिव्य' हिंडोला था जिस ओर.
झूला था मंजुल बेलों का-
  जिस पर बैठे श्यामा-श्याम,
पुष्पों से था सजा हुआ,
  जो मन को लगता था अभिराम.

           (६४)
विविध लताओं से आवेष्टित,
  लगी हुयी थी रेशम-डोर,
देख-देखकर श्याम घटाएँ,
  वहाँ नृत्य करते थे मोर.
कंठदेश में राधा के थी,
  वाम भुजा जगदीश्वर की,
अधरों पर जा टिकी थी वंशी,
  दक्षिण कर में ईश्वर की.

           (६५)
गोरोचन के 'दिव्य' तिलक से,
  शोभित होता प्रभु का भाल,
लटक रहीं घुँघराली अलकें,
  अति प्रसन्न-मुख थे गोपाल.
सबके मन को खींच रही थी,
  प्रभु की वह बाँकी चितवन,
प्राणप्रिया को  निरख-निरख,
  मोहित होते थे मनमोहन.

श्रीकृष्ण का वंशीवादन


            (६६)
प्रभु ने वंशी मधुर बजायी,
  हुआ उन्हें  अनुपम आह्लाद,
लगा गूँजने उस मुरली में,
  कृष्णप्रिया श्रीराधा - नाद.
यमुना की उत्ताल तरंगें-
  लता-वृक्ष-वन-पक्षीगण,
सभी गा उठे 'राधे-राधे',
  गूँज उठा व्रज-वृन्दावन.

श्रीराधे-नाद की महिमा


           (६७) 
सकल वाद्य प्रिय गोपीजन के,
  नूपुर-घुँघरू की झंकार,
सबने वंशी के स्वर में,
  'श्रीराधे-राधे' किया पुकार.
श्रीललिता - संग सखी विशाखा,
  खड़ी लिये पूजा-उपचार,
सब सखियों के मध्य ठगी-सी,
  बनकर हैं कर रही विचार.

           (६८)
भूल गयीं वे राधा-माधव -
  को पहनना वनमाला,
दोनों ने उन मालाओं को,
  निज कंधों पर ही डाला.
ताली दे-दे मधुर स्वरों में,
  'राधे-राधे' गाती थीं,
युगलरूप के 'दिव्य' ध्यान में,
  तन्मय होती जाती थीं.

           (६९)
जगी नहीं थी आज आरती,
  रक्खा थाली में कर्पूर,
पूजा की सब सामग्री भी,
  धरी वहाँ प्रभु से कुछ दूर.
'श्रीराधे-राधे' गा-गाकर,
  लगा घूमने आरति-थाल,
युगलरूप की परिक्रमा कर,
  हुयी आरती आज निहाल.

           (७०)
प्रतिदिन जलकर 'दिव्य' आरती,
  हुयी शान्त अपने मन में,
मिली उसे थी चिर शीतलता,
  सभी मुदित वृन्दावन में,
परम मनोहर उस निकुंज में,
  लहराया सुख का सागर,
राधा-नाम सुधा-धारा से,
  भरते सब मन का गागर.

           (७१)
श्रीराधे के महानाद से,
  नाच उठा वन का कण-कण,
लगे झूमने वनमाली भी,
  हुआ प्रफुल्लित सबका मन.
पूर्ण हुयी इस भाँति वहाँ पर,
  श्रीराधा-पूजा न्यारी,
ब्रजदेवी के पुण्य धाम,
  नामों की है महिमा न्यारी.

श्रीराधा के मंत्र,कवच और पूजा की महिमा


           (७२) 
पूछा तब सखियों ने प्रभु से,
  विनय हमारी है घनश्याम,
श्रीराधा की अद्भुत महिमा,
  त्रिभुवन में है करुणा धाम !
सर्वप्रथम किसने की पूजा,
  व्रजदेवी की पृथ्वी पर ?
महिमा इनके मंत्र-कवच-
  पूजा की क्या है प्राणेश्वर ?

           (७३)
बोले राधानाथ तुम्हारी,
  जिज्ञासा है अति पावन,
सुनो ध्यान से ये सब बातें-
  हैं रहस्य की मन-भावन.
भूमण्डल के पुण्य-क्षेत्र-
  भारत में जन्मा एक नरेश,
आया जब संकट भारी,
  तब हुआ उसे शिव का आदेश.

           (७४)
कर उपासना तू राधा की,
  चरण-कमल का ले आधार,
विप्र-शाप से राजन ! फिर,
  निश्चय होगा तेरा उद्धार.
श्रीराधा-सम परम दयामयि,
  शक्ति नहीं है त्रिभुवन में,
राधा-पूजा सर्वोपरि है,
  कर धारण अपने मन में.

          (७५)
दे आज्ञा राजा सुयज्ञ को,
  चले गये शिव-गौरीश्वर,
सर्वप्रथम उस राजा ने की,
  राधा-पूजा पृथ्वी पर,
दूर हुये सब संकट उसके,
  अंत समय पाया मम-धाम,
श्रीराधा-पूजा से जग में,
  पूरे होते सब मन-काम.

           (७६)
भक्ति-भाव से जो प्राणी,
  राधा-अष्टमी मनाता है,
श्रीराधा की परम दया से,
  महा-'दिव्य' सुख पाता है.
ब्रजदेवी की पूजा कर जब,
  होता राधा-भक्त अनन्य,
तभी पहुँचता महारास में,
  हो जाता है जीवन धन्य.

           (७७) 
अब राधा के महामंत्र की,
  सुनो सभी महिमा न्यारी,
जिसको जपते ही प्राणी के,
  कट जाते संकट भारी.
'ह्रीं श्रीराधायै स्वाहा' का,
  जो जन करते हैं नित जाप, 
उज्जवल होता जीवन उनका,
  मिट जाते जन्मों के पाप.

           (७८) 
सर्वप्रथम इस महामंत्र का,
  मोहन ने जप किया महान,
मैं मोहन जो मोहे मुझको,
  ऐसी देवी का कर ध्यान.
मुझसे विष्णु,विष्णु से ब्रह्मा,
  ब्रह्मा से फिर पाये धर्म,
देव सकल इस मंत्र शक्ति से -
  ही करते सब अपने कर्म.

           (७९)
परम धर्म है वैष्णव-जन का,
  करें राधिका-पूजा-ध्यान,
गायत्री है छन्द मंत्र का,
  ऋषि हैं नारायण भगवान्.
श्रीराधा हैं मंत्र-देवता,
  तारा बीज सु-शक्ति महान,
शक्ति बीज भी शक्ति है इनकी,
  जिससे मिट जाते अज्ञान.

           (८०)
श्रीराधा के 'दिव्य' कवच का,
  पाठ करेगा जो साधक,
नहीं बन सकेगा उसके,
  जीवन-पथ में कोई बाधक.
राजद्वार,संग्राम,शत्रु-भय,
  जब आये संकट का काल,
पाठ करे 'राधिका-कवच' का,
  तुरत कटेगा संकट-जाल.

          (८१)
ब्रह्मा इसके ही प्रताप से,
  रचते हैं यह विश्व महान.
पालन करते हैं लक्ष्मीपति,
  सृष्टि मिटाते शिव भगवान्.
धीर बुद्धि है जिस प्राणी की,
  उसको ही दे कवच का ज्ञान,
गोपनीय और परम गूढ़,
  यह तत्व बताते वेद-पुराण.
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